मध्य पूर्व की सियासत इस समय बारूद के ढेर पर बैठी है। ईरान और अमेरिका के बीच ज़ुबानी जंग अब उस मोड़ पर पहुँच चुकी है, जहाँ से वापसी का रास्ता दिन-ब-दिन धुंधला होता जा रहा है। ईरानी विदेश मंत्रालय की ताज़ा चेतावनियों ने साफ कर दिया है कि तेहरान अब सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रहने वाला। उन्होंने संकेत दिए हैं कि अगर अमेरिका या उसके सहयोगियों ने कोई भी दुस्साहस किया, तो उसका जवाब सिर्फ मिसाइलों से नहीं बल्कि ज़मीनी सैन्य कार्रवाई से भी दिया जा सकता है।
यह तनाव अचानक पैदा नहीं हुआ। वर्षों से चल रहे प्रतिबंधों, गुप्त अभियानों और क्षेत्रीय प्रभुत्व की लड़ाई ने इस स्थिति की नींव रखी है। जब कोई देश यह कहता है कि वह ज़मीनी हमले के लिए समय गिन रहा है, तो समझ लेना चाहिए कि कूटनीति के दरवाजे लगभग बंद होने की कगार पर हैं। For a more detailed analysis into this area, we recommend: this related article.
तनाव की असली वजह और तेहरान का कड़ा रुख
वॉशिंगटन और तेहरान के बीच विश्वास की कमी कोई नई बात नहीं है। 2018 में परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद से ही दोनों देशों के बीच दूरियाँ बढ़ती चली गईं। इसके बाद आर्थिक प्रतिबंधों के कड़े दौर ने ईरान के आर्थिक ढांचे को काफी नुकसान पहुँचाया।
ईरान का मानना है कि अमेरिका क्षेत्रीय शक्तियों का इस्तेमाल करके उसे अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है। इसी के जवाब में ईरान ने अपने "एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस" यानी प्रतिरोध के अक्ष को मजबूत किया है। इसमें लेबनान का हिजबुल्लाह, यमन के हूति विद्रोही और इराक के कई उग्रवादी समूह शामिल हैं। To get more context on the matter, comprehensive analysis can be read on NBC News.
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वे किसी भी हमले का जवाब अपनी शर्तों पर देंगे। तेहरान का यह कड़ा बयान अमेरिका को यह सीधा संदेश देने की कोशिश है कि मध्य पूर्व में किसी भी नए सैन्य अभियानों की कीमत बहुत भारी पड़ सकती है।
मध्य पूर्व में ज़मीनी संघर्ष का व्यापक असर
अगर यह जुबानी जंग असल जंग में बदलती है, तो इसका असर सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा तंत्र पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा।
- वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट: होर्मुज की खाड़ी (Strait of Hormuz) दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकीर्ण समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। अगर यहाँ कोई सैन्य झड़प होती है, तो कच्चे तेल की कीमतें अचानक आसमान छू सकती हैं।
- क्षेत्रीय अस्थिरता: इराक, सिरिया और लेबनान पहले से ही राजनीतिक और आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं। एक नया बड़ा युद्ध पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर देगा।
- नागरिकों का विस्थापन: किसी भी ज़मीनी हमले का सबसे पहला और भयावह असर आम नागरिकों पर पड़ता है। इससे एक बड़ा मानवीय संकट पैदा हो सकता है।
वाशिंगटन की रणनीति और पेंटागन का रुख
दूसरी तरफ, अमेरिका भी अपनी सैन्य उपस्थिति को लेकर किसी तरह की ढील देने के मूड में नहीं दिखता। पेंटागन ने हाल के महीनों में फारस की खाड़ी में अपनी नौसैनिक और हवाई क्षमताओं में वृद्धि की है। अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना है कि ईरान को रोकने का एकमात्र तरीका मजबूत सैन्य उपस्थिति और कड़े आर्थिक दबाव का संतुलन बनाए रखना है।
हालांकि, वाशिंगटन के भीतर भी एक बड़ा वर्ग इस बात से वाकिफ है कि मध्य पूर्व में एक और ज़मीनी युद्ध में उलझना अमेरिका के अपने हित में नहीं होगा। इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों के बाद अमेरिकी जनता और नीति निर्माता एक और लंबे सैन्य संघर्ष के पक्ष में नहीं हैं।
इतने तनाव के बावजूद पर्दे के पीछे से कूटनीतिक रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। कतर, ओमान और स्विट्जरलैंड जैसे मध्यस्थ देश दोनों पक्षों के बीच संदेशों के आदान-प्रदान में लगे रहते हैं।
कूटनीति ही एकमात्र ऐसा तरीका है जो इस क्षेत्र को एक और विनाशकारी युद्ध से बचा सकता है। इसके लिए दोनों पक्षों को अपनी-अपनी शर्तों में थोड़ा लचीलापन दिखाना होगा और क्षेत्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। आने वाले कुछ सप्ताह इस पूरे क्षेत्र के भविष्य का फैसला करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं।