लेबनान एक बार फिर इतिहास के सबसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है। इजराइल और लेबनान के बीच जिस शांति समझौते या डील की रूपरेखा तैयार की जा रही थी, उसे हिज्बुल्लाह ने साफ तौर पर खारिज कर दिया है। हिज्बुल्लाह का कहना है कि यह सौदा कोई शांति समझौता नहीं बल्कि लेबनान के भीतर 'भाई-भाई को आपस में लड़ाने' की एक गहरी साजिश है। जब कोई संगठन इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करता है, तो उसका सीधा मतलब होता है कि बात सिर्फ सरहद की लड़ाई की नहीं रह गई है। अब बात लेबनान के आंतरिक ताने-बाने और उसके अस्तित्व पर आ गई है।
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए आपको केवल ऊपरी खबरों को देखना बंद करना होगा। लोग अक्सर सोचते हैं कि यह सिर्फ इजराइल और एक सशस्त्र समूह के बीच का सीमा विवाद है। सच इससे कहीं ज्यादा उलझा हुआ है। यह लेबनान के भीतर की राजनीति, वहां की सेना, हिज्बुल्लाह के हथियारों और इजराइल की सुरक्षा शर्तों का एक ऐसा कॉकटेल है जो कभी भी फट सकता है।
इस सौदे में ऐसा क्या है जिससे भड़का हिज्बुल्लाह
इजराइल और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों की तरफ से जो शर्तें सामने रखी जा रही हैं, उनमें सबसे बड़ा पेंच हिज्बुल्लाह के निशस्त्रीकरण और उसकी स्थिति को लेकर है। इजराइल चाहता है कि हिज्बुल्लाह लिटानी नदी के उत्तर में चला जाए और दक्षिणी लेबनान में सिर्फ लेबनान की आधिकारिक सेना (LAF) और संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना (UNIFIL) का नियंत्रण हो।
अब बात आती है उस मुख्य शर्त की जिसने बारूद में चिंगारी का काम किया है। इजराइल इस बात पर अड़ा है कि अगर भविष्य में हिज्बुल्लाह किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है, तो इजराइल को लेबनान के भीतर घुसकर सैन्य कार्रवाई करने का पूरा अधिकार होगा। हिज्बुल्लाह के प्रमुख नेताओं और लेबनान के कई राजनीतिक धड़ों के लिए यह शर्त पूरी तरह से अस्वीकार्य है। उनका तर्क है कि यह लेबनान की संप्रभुता को सीधे तौर पर बेचना है।
हिज्बुल्लाह ने इसे 'भाई-भाई के बीच लड़ाई कराने वाला सौदा' इसलिए कहा क्योंकि इस डील के तहत लेबनान की सेना को यह जिम्मेदारी दी जा रही है कि वह हिज्बुल्लाह को हथियारों के इस्तेमाल से रोके। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि लेबनान की सेना को अपने ही देश के एक बड़े और सबसे ताकतवर सशस्त्र धड़े के खिलाफ हथियार उठाने होंगे। लेबनान का इतिहास गवाह है कि जब भी वहां की सेना और आंतरिक गुटों के बीच टकराव हुआ है, देश खूनी गृहयुद्ध की आग में झुलस गया है। हिज्बुल्लाह इसी बात का डर दिखा रहा है और शायद यह डर पूरी तरह से काल्पनिक भी नहीं है।
लेबनान की सेना और हिज्बुल्लाह का आंतरिक समीकरण
लेबनान की सेना की स्थिति को समझना बहुत जरूरी है। यह दुनिया की बाकी नियमित सेनाओं जैसी मजबूत नहीं है। लेबनानी सेना के पास न तो आधुनिक वायुसेना है और न ही इजराइल का मुकाबला करने लायक भारी हथियार। इसके विपरीत, हिज्बुल्लाह के पास आधुनिक मिसाइलें, ड्रोन और हजारों प्रशिक्षित लड़ाके हैं। कई मायनों में हिज्बुल्लाह लेबनान की आधिकारिक सेना से कहीं ज्यादा ताकतवर है।
इसके अलावा, लेबनान की सेना का ढांचा वहां की धार्मिक और सांप्रदायिक आबादी के संतुलन पर आधारित है। सेना में शिया, सुन्नी और ईसाई सभी शामिल हैं। हिज्बुल्लाह एक शिया संगठन है जिसकी जड़ें लेबनान के शिया समाज में बहुत गहरी हैं। अगर लेबनान की सेना को हिज्बुल्लाह के खिलाफ बल प्रयोग करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो सेना के भीतर ही फूट पड़ने का खतरा पैदा हो जाएगा। सैनिक अपने ही भाइयों पर गोली चलाने से इनकार कर सकते हैं। यही वह 'भाई-भाई की लड़ाई' है जिसका जिक्र हिज्बुल्लाह ने अपने बयान में किया है।
पश्चिमी देश और इजराइल लगातार लेबनानी सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि वह देश में हथियारों पर सिर्फ अपना एकाधिकार रखे। सैद्धांतिक रूप से यह बात बिल्कुल सही लगती है। किसी भी संप्रभु देश में दो सेनाएं नहीं हो सकतीं। लेकिन लेबनान का जमीनी सच अलग है। वहां हिज्बुल्लाह को एक राजनीतिक दल और एक सामाजिक संस्था के रूप में भी बड़ी स्वीकार्यता मिली हुई है।
इजराइल का नजरिया और उसकी सुरक्षा की जिद
दूसरी तरफ इजराइल का अपना पक्ष है। इजराइल का मानना है कि अक्टूबर 2023 के बाद से जो स्थिति बनी है, उसमें वह अपने उत्तरी हिस्से के नागरिकों को तब तक वापस नहीं बसा सकता जब तक हिज्बुल्लाह उसकी सीमा से दूर न चला जाए। इजराइल के लिए यह कोई सामान्य कूटनीतिक समझौता नहीं है। यह उसके अस्तित्व और सुरक्षा की गारंटी का सवाल है।
इजराइल ने साफ कर दिया है कि वह केवल कागजी समझौतों पर भरोसा नहीं करेगा। साल 2006 के युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव 1701 पास हुआ था, जिसमें कहा गया था कि दक्षिणी लेबनान में हिज्बुल्लाह की कोई मौजूदगी नहीं होगी। लेकिन पिछले दो दशकों में हिज्बुल्लाह ने उसी इलाके में अपना सबसे बड़ा बंकर और मिसाइल नेटवर्क खड़ा कर लिया। इजराइल का कहना है कि जब संयुक्त राष्ट्र और लेबनान की सेना प्रस्ताव 1701 को लागू कराने में नाकाम रही, तो वह दोबारा उन्हीं के भरोसे अपनी सुरक्षा को दांव पर नहीं लगा सकता। इसीलिए इजराइल खुद कार्रवाई करने की छूट मांग रहा है।
लेबनान का आम नागरिक इस त्रिकोणीय संघर्ष में कहां है
इस पूरी खींचतान में लेबनान का आम नागरिक सबसे ज्यादा पिस रहा है। लेबनान पिछले कई सालों से भयानक आर्थिक मंदी से गुजर रहा है। वहां की मुद्रा बेकार हो चुकी है, बैंकों में लोगों का पैसा डूब चुका है और बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी सरकार नहीं दे पा रही है। इस बदहाली के बीच महीनों से चल रही बमबारी ने देश को पूरी तरह तोड़ दिया है।
लेबनान के लोग युद्ध तो नहीं चाहते, लेकिन वे अपने ही देश में एक और गृहयुद्ध की आशंका से भी कांप उठते हैं। ईसाई और सुन्नी आबादी का एक बड़ा हिस्सा हिज्बुल्लाह की नीतियों से नाराज है। उनका मानना है कि हिज्बुल्लाह ने ईरान के इशारे पर पूरे लेबनान को इस युद्ध में झोंक दिया है। वहीं दूसरी तरफ, शिया आबादी और हिज्बुल्लाह के समर्थक इसे इजराइल के आक्रमण के खिलाफ अपनी संप्रभुता की रक्षा मानते हैं। यह आंतरिक विभाजन ही लेबनान की सबसे बड़ी कमजोरी है, जिसका फायदा बाहरी ताकतें उठाती हैं।
आगे क्या होने वाला है
हिज्बुल्लाह द्वारा इस समझौते को ठुकराए जाने के बाद अब बातचीत के रास्ते लगभग बंद हो गए हैं। इसका सीधा मतलब है कि आने वाले दिनों में सैन्य टकराव और तेज होगा। इजराइल अपने हमलों का दायरा बढ़ा सकता है ताकि हिज्बुल्लाह पर समझौते के लिए दबाव बनाया जा सके। वहीं हिज्बुल्लाह भी इजराइल के अंदरूनी इलाकों में मिसाइल हमले तेज करके यह दिखाने की कोशिश करेगा कि वह झुकने वाला नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों, विशेष रूप से अमेरिका और फ्रांस के लिए यह एक बड़ा झटका है। वे एक ऐसी बीच की राह तलाश रहे थे जिससे इजराइल की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो जाए और लेबनान की सरकार भी न गिरे। लेकिन हिज्बुल्लाह के इस कड़े रुख ने साफ कर दिया है कि जब तक उसकी शर्तों को शामिल नहीं किया जाता, लेबनान की कोई भी सरकार किसी भी कागज पर दस्तखत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी।
मौजूदा हालात को देखते हुए लेबनान के नीति निर्माताओं और क्षेत्रीय ताकतों को तुरंत अपनी रणनीति बदलनी होगी। अगर इस समझौते को जबरन थोपने की कोशिश की गई, तो लेबनान के भीतर हिंसक झड़पें शुरू हो सकती हैं। लेबनान को इस संभावित तबाही से बचाने के लिए अब सारा दारोमदार इस बात पर है कि क्या स्थानीय राजनीतिक दल हिज्बुल्लाह के साथ मिलकर कोई ऐसा आंतरिक फॉर्मूला निकाल पाते हैं जो इजराइल को भी स्वीकार्य हो और देश को भी न बांटे। समय बहुत कम है और बारूद का ढेर कभी भी सुलग सकता है।