मिडिल ईस्ट सुलग रहा है पर परदे के पीछे कुछ और ही चल रहा है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच दुश्मनी नई नहीं है। फिर भी दोनों पक्ष चुपचाप मेज पर बैठे हैं। तनाव के बीच अमेरिका-ईरान में बातचीत जारी है और राजनयिक गलियारों से खबरें हैं कि हर मोर्चे पर युद्ध खत्म होने की उम्मीद जताई जा रही है। क्या यह वाकई मुमकिन है? या यह सिर्फ एक और कूटनीतिक दिखावा है? सच यह है कि दोनों देश युद्ध नहीं चाहते। दोनों के पास पीछे हटने के अपने ठोस आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं।
इस पर्दे के पीछे की कहानी को समझना ज़रूरी है। मीडिया अक्सर केवल मिसाइलों और बयानों को दिखाता है। असली खेल ओमान और कतर के बंद कमरों में होता है। वहां राजनयिक हाथ मिलाते हैं और कड़वी कॉफी पर समझौते के मसौदे तैयार करते हैं।
तनाव के बीच अमेरिका-ईरान में बातचीत जारी रहने की बड़ी वजहें
जमीन पर हालात चाहे जितने भी खराब दिखें, बातचीत का सिलसिला कभी नहीं टूटता। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि दोनों ही पक्ष सीधे सैन्य टकराव के भयानक नतीजों को अच्छी तरह जानते हैं। अमेरिका इस समय दुनिया के कई मोर्चों पर उलझा हुआ है। वह मिडिल ईस्ट में एक और लंबे और खर्चीले युद्ध में नहीं फंसना चाहता।
ईरान की हालत भी अलग नहीं है। प्रतिबंधों ने उसकी कमर तोड़ दी है। घरेलू मोर्चे पर महंगाई और जनता का असंतोष चरम पर है। तेहरान को पता है कि अमेरिका के साथ सीधा युद्ध उसकी पूरी व्यवस्था को तबाह कर सकता है। इसलिए जब दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंचता है, तो वे तुरंत गुप्त चैनलों को सक्रिय कर देते हैं। ओमान के सुल्तान इसमें हमेशा मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। संदेशों का आदान-प्रदान होता है और रेड लाइन्स तय की जाती हैं ताकि कोई भी कदम सीधे युद्ध में न बदल जाए।
तेल का खेल और ग्लोबल इकोनॉमी का दबाव
युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं लड़ा जाता, यह पैसों से लड़ा जाता है। जैसे ही खाड़ी में तनाव बढ़ता है, कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। अमेरिका में चुनाव के समय या आर्थिक स्थिरता के दौर में तेल की कीमतों का बढ़ना सरकार के लिए आत्मघाती होता है। अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि ग्लोबल मार्केट में सप्लाई बनी रहे।
ईरान भी अपना तेल बेचना चाहता है। भले ही वह इसे ब्लैक मार्केट या चीन के जरिए डिस्काउंट पर बेचे, लेकिन उसे कैश की सख्त जरूरत है। अगर हॉर्मुज जलडमरूमध्य में कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई होती है, तो दुनिया का एक-तिहाई समुद्री तेल व्यापार ठप हो जाएगा। यह एक ऐसा झटका होगा जिसे न तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था झेल पाएगी और न ही ईरान की। यही वजह है कि दोनों देश एक-दूसरे पर प्रतिबंध तो लगाते हैं, लेकिन तेल के रूट को पूरी तरह ब्लॉक करने से बचते हैं।
प्रॉक्सी वॉर और सीधे टकराव का अंतर
समझदारी इसी में है कि दुश्मन को सीधे मारने के बजाय उसके प्यादों को कमजोर किया जाए। ईरान यही रणनीति अपनाता है। वह खुद सामने नहीं आता। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हुथी और इराक में शिया मिलिशिया उसके मोहरे हैं। अमेरिका भी इस बात को समझता है। जब भी अमेरिकी ठिकानों पर हमले होते हैं, तो अमेरिका ईरान के प्रॉक्सी संगठनों पर जवाबी कार्रवाई करता है, सीधे ईरान पर नहीं।
यह एक तयशुदा स्क्रिप्ट की तरह काम करता है। ईरान अपने सहयोगियों को हथियारों की सप्लाई जारी रखता है ताकि उसका दबदबा बना रहे। अमेरिका उन हथियारों को नष्ट करता है ताकि उसके सहयोगियों जैसे इजरायल और सऊदी अरब को सुरक्षा का अहसास हो। इस पूरे ड्रामे के बीच दोनों मुख्य खिलाड़ी एक-दूसरे को सीधा नुकसान पहुंचाने से बचते हैं। यही वह संतुलन है जो बातचीत के रास्ते को हमेशा खुला रखता है।
न्यूक्लियर डील का भविष्य और क्षेत्रीय सुरक्षा
सबसे बड़ा मुद्दा परमाणु कार्यक्रम का है। साल 2015 के समझौते से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद से ईरान ने यूरेनियम संवर्धन की रफ्तार बहुत बढ़ा दी है। वह परमाणु बम बनाने के बेहद करीब पहुंच चुका है। वाशिंगटन के लिए यह सबसे बड़ा सिरदर्द है। अमेरिका का मानना है कि सैन्य हमला ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सिर्फ कुछ साल के लिए टाल सकता है, उसे खत्म नहीं कर सकता।
बातचीत का असली मकसद एक नया फ्रेमवर्क तैयार करना है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करे और बदले में उसे प्रतिबंधों में कुछ ढील मिले। ईरान भी जानता है कि परमाणु हथियार बनाने की कोशिश उसे पूरी दुनिया से अलग-थलग कर देगी। इसलिए वह बातचीत की मेज पर अपनी शर्तों को मजबूत करने के लिए परमाणु कार्ड का इस्तेमाल करता है।
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है। जो लोग केवल युद्ध की भाषा समझते हैं, वे इतिहास से सबक नहीं लेते। खाड़ी में शांति स्थापित करने के लिए प्रतिबंधों को हटाना और सुरक्षा की गारंटी देना जरूरी होगा। अमेरिका को ईरान की क्षेत्रीय चिंताओं को समझना होगा और ईरान को अपने प्रॉक्सी नेटवर्क पर लगाम लगानी होगी। जब तक दोनों पक्ष अपनी जिद नहीं छोड़ेंगे, तब तक यह बातचीत सिर्फ एक अस्थाई राहत बनकर रह जाएगी, कोई स्थाई समाधान नहीं।
शांति का रास्ता साफ करने के लिए कुछ जरूरी रणनीतिक कदम उठाने होंगे। सबसे पहले ओमान और कतर जैसे तटस्थ देशों के माध्यम से बैक-चैनल डिप्लोमेसी को और मजबूत करना होगा ताकि गलतफहमियों के कारण कोई बड़ा युद्ध न छिड़ जाए। इसके साथ ही अमेरिका को ईरान पर लगाए गए कुछ चुनिंदा आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना चाहिए ताकि तेहरान को बातचीत की मेज पर बने रहने का ठोस फायदा दिखे। ईरान को भी अपनी तरफ से पहल करते हुए रेड सी और अन्य महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर हुथी विद्रोहियों के हमलों को तुरंत रोकना होगा। आखिरकार एक क्षेत्रीय सुरक्षा परिषद का गठन किया जाए जिसमें अमेरिका, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हों, ताकि मिडिल ईस्ट के विवादों को बिना किसी सैन्य टकराव के सीधे संवाद से सुलझाया जा सके।